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इंदौर32 मिनट पहले

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आज 13 अगस्त को ‘वर्ल्ड आर्गन डोनेशन डे’ हैं। इसकी उपयोगिता बताने के लिए शनिवार शाम एक प्राइवेट हॉस्पिटल द्वारा एक अनूठा आयोजन किया गया। इसमें 50 से ज्यादा उन डोनर्स (लाइव) को बुलाया गया जिन्होंने अपनी किडनी सहित अन्य अंग अपनों को, रिश्तेदारों को या अन्य जरूरतमंद को डोनेट किए हैं। इसके अलावा कैडेवर डोनर्स (ब्रेन डेड वाले) के परिजन भी शामिल थे। ये वे हैं जिन्होंने नाजुक समय में अपनों की मौत के बाद उनके अंगदान करवाए। इन लोगों ने अपने अनुभव साझा किए और लोगों से अपील की कि वे अंगदान के प्रति जागरूकता दिखाएं। कार्यक्रम में इन सभी का सम्मान किया गया।

इंदौर के नवीन जैन ने बताया कि उनकी तीन बेटियां हैं। सबसे छोटी 13 वर्षीय बेटी को किडनी की बीमारी थी। जब किडनी डोनेशन की बात आई तो पत्नी की ब्लड ग्रुप O पॉजिटिव था जबकि ‌‌B पॉजिटिव की जरूरत थी। मेरी मां की किडनी अच्छी थी लेकिन हार्ट की समस्या थी। इस पर मैंने अपनी किडनी बेटी को डोनेट की जो अब पूरी तरह स्वस्थ है। इस मौके पर वे बेटी को भी साथ लाए थे। उन्होंने कहा मुझे भी कोई परेशानी नहीं है। यह बात अपनों को ऑर्गन डोनेट करने की नहीं है। अगर आपके शरीर में कोई दो अंग ऐसे हैं जिनमें से एक से जीवन जिया जा सकता है तो जरूरतमंद को जरूर डोनेट करें।

देने और डोनेट करने का महत्व समझना होगा

परमानंद शर्मा ने बताया कि मेरे छोटे बेटे की दोनों किडनियां डैमेज हो गई थी। इस पर मैंने उसने अपनी एक किडनी डोनेट की है। इसके बाद से हम दोनों स्वस्थ हैं। उनका कहना है कि देने और डोनेट करने में बहुत अंतर है। कोई भी दी हुई चीज हम वापस ले सकते हैं लेकिन डोनेट की हुई को वापस नहीं ली जाती। उन्होंने लोगों से इसके लिए जागरूक होने की अपील की। एक महिला ने बताया कि मैंने एक किडनी अपने भाई को डोनेट की है। इसे लेकर मेरे पति और बच्चों को किसी प्रकार की आपत्ति नहीं थी। हम दोनों स्वस्थ हैंं। मुझे खुशी है कि मेरी किडनी डोनेट करने से उसे नया जीवन मिला।

बहनोई को डोनेट की किडनी

नसुरुल्लागंज के एक व्यक्ति ने बताया कि मैंने अपने बहनोई को डेढ़ माह पहले किडनी डोनेट की है। इसके पूर्व कई रिश्तेदारों ने किडनी देने की इच्छा जताई लेकिन मैच नहीं हुई। अब मुझे कोई परेशानी नहीं है। इंदौर निवासी एक महिला ने अपने बेटे को किडनी डोनेट की। उन्होंने कहा लोग घबराए नहीं बल्कि किसी को नया जीवन देने के लिए आगे आएं।

एक महिला ने कहा कि पिता की ब्रेन डेड हुई थी। इस पर तब मुस्कान ग्रुप ने उनके ऑर्गन्स डोनेशन के लिए मेरी कॉउंसलिंग की। इस दौरान ऐसे नाजुक समय में निर्णय लेना कठिन था कि मैं भाई से कैसे बात करूं। फिर सोचा इससे अच्छा काम कोई नहीं हो सकता। पापा की सोच भी हमेशा ऐसी ही रही थी कि हम अगर किसी को कुछ दे सके तो वह जिंदगी का सबसे अच्छा दिन होता है। फिर मैंने भाई से बात की और परिवार से परामर्श कर उनके ऑर्गन्स डोनेट की। उन्होंने कहा कि लोगों को समझना चाहिए कि ब्रेन डेड की स्थिति में करीब आठ ऑर्गन्स डोनेट किए जा सकते हैं और वे उनकी जिंदगी बचा सकते हैं। आज हमारा पूरा परिवार अंग दान के प्रति संकल्पित हैं। लोग अंगदान के प्रति जागरूक रहें।

ICU इंचार्ज तुरंत परिजन की काउंसलिंग करें, SOTO को सूचना दें

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सांसद शंकर लालवानी थे। उन्होंने कहा कि अंगदान के मामले में इंदौर की स्थिति काफी अच्छी है। यहां 51 ग्रीन कॉरिडोर बन चुके हैं तथा ढाई सौ लोगों को नया जीवन मिला है। फिर भी इतना पर्याप्त नहीं है। सरकारी व प्राइवेट अस्पताल के आईसीयू इंचार्ज को चाहिए कि वे ब्रेन डेड के पेशेंट के मामले में परिजन की काउंसिलिंग करें और इसकी जानकारी तुरंत स्टेट ऑर्गन्स ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (SOTO) को दें। अस्पतालों में अंगदान के बैनर ऐसी जगह लगाए जाते हैं जो दिखते नहीं हैं। इसे प्रमुखता से लगवाएं और ऐसी व्यवस्था करें कि परिजन की काउंसिलिंग आसानी से हो।

खुद के किडनी ट्रांसप्लांट के बाद फिर इलाज कर रहे इलाज

सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अशोक वाजपेयी ने कहा मैंने 4 साल अपना किडनी ट्रांसप्लांट करवाया था और ठीक होने के बाद मैं अपने मरीजों को आराम से देख रहा हूं। डॉ. जय कृपलानी ने कहा किडनी ट्रांसप्लांट की लाइफ सेविंग पॉवर बेजोड़ है। डोनर्स और ऑर्गन की आवश्यकता बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। 2021 में केवल 14% मृत डोनर थे। अभी जागरूकता बढ़ाने और अंतर को कम करने की आवश्यकता है। अपनों की मृत्यु बाद आर्गन डोनेशन के बारे में जागरूकता फैलाना महत्वपूर्ण है। इंदौर को अभी 215 कैडवर ऑर्गन डोनेशन होने की आवश्यकता है।

सात माह में 60 से ज्यादा ट्रांसप्लांट

डॉ. शिल्पा सक्सेना (पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजिस्ट) ने बच्चों में ट्रांस्प्लांट द्वारा क्रॉनिक किडनी डिजीस के बारे में बताया। इस मौके पर हॉस्पिटल के कंसल्टेंट डॉ. जय कृपलानी, डॉ. संदीप सक्सेना, डॉ. सौरभ चिपडे, डॉ. मनीष खासगीवाले, डॉ. क्षितिज दुबे, डॉ. निकुंज जैन आदि ने बताया कि पिछले सात महीनों में 60 से अधिक ट्रांसप्लांट किए गए हैं।

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