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भोपाल39 मिनट पहलेलेखक: संतोष सिंह

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महू में 14 अप्रैल को डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर प्रदेश में तीसरे मोर्चे की घोषणा होगी। तीसरे मोर्चे की धुरी भीम आर्मी होगी। समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रीय लोक दल (रालोद), गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा), जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस), पिछड़ा मोर्चा उसके घटक होंगे। तीसरा मोर्चा आदिवासी सीएम और तीन डिप्टी सीएम (दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक) के फाॅर्मूले पर चुनाव में उतरने की तैयारी में है।

ये मोर्चा एमपी की सभी 230 सीटों पर प्रत्याशी उतारेगा, लेकिन उनका जोर दलित और आदिवासी बहुल सीटों को जीतने पर रहेगा। इस मोर्चा ने आकार लिया, तो भाजपा-कांग्रेस को 82 सीटों पर कड़ी चुनौती मिलेगी। भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आजाद का दावा है कि प्रदेश में चल रहे धनतंत्र की राजनीति को तीसरा मोर्चा ही चुनौती दे सकता है। प्रदेश के लोग बदलाव चाहते हैं। ये परिवर्तन तीसरा मोर्चा के गठन से होगा।

भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर की राजनीतिक शैली दलित युवाओं में खासी लोकप्रिय हैं। यही कारण है कि प्रदेश के दलित युवा उनसे तेजी से जुड़ रहे हैं। हर जिले में भीम आर्मी का संगठन खड़ा किया जा रहा है। भीम आर्मी का प्रसार प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के लिए भी खतरा है। प्रदेश की 50 सीटों पर बसपा का बड़ा प्रभाव है। भीम आर्मी की कोशिश बसपा के वोट बैंक को अपने पाले में लाने की है। इसके अलावा भीम आर्मी की नजर प्रदेश में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 35 सीटों पर भी है। इन सीटों पर 15 से लेकर 31 प्रतिशत वोटर हैं। इन सीटों पर एक प्रतिशत से लेकर 32 प्रतिशत वोटर आदिवासी हैं।

123 सीटों पर एससी-एसटी का गठजोड़ बिगाड़ेगा बीजेपी-कांग्रेस का गणित

भीम आर्मी की नजर प्रदेश की 123 सीटों पर है। इसमें 35 एससी और 47 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। प्रदेश की 41 सामान्य सीटों पर एससी-एसटी वोटर निर्णायक भूमिका में है। यदि भीम आर्मी महू में डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर जयस और गाेंगपा को तीसरे मोर्चे का घटक बनने को राजी कर लेते हैं, तो ये बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए चिंता का सबब होगा। यही कारण है कि भीम आर्मी ने प्रदेश में आदिवासी सीएम बनाने की बात कही है। आदिवासी सीएम के बहाने प्रदेश की 23 प्रतिशत आदिवासी आबादी को साधने की कोशिश है।

वहीं दलित, मुस्लिम और ओबीसी को डिप्टी सीएम बनाने का ऐलान किया है। प्रदेश में 2011 की जनगणना के मुताबिक 50 लाख मुस्लिम वोटर हैं। ये मालवा-निमाड़ और भोपाल संभाग की 40 सीटों पर असरकारक हैं। पहली बार किसी पार्टी ने मुस्लिम डिप्टी सीएम की बात कही है। दलित-आदिवासियों के साथ मुस्लिमों का गठजोड़ प्रभावी होगा।

यूपी के गठबंधन को एमपी में आजमाने की तैयारी

भीम आर्मी का यूपी में सपा और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के साथ गठबंधन हुआ है। जबकि सपा ने 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (गोंगपा) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। तब सपा ने प्रदेश में 52 सीटों पर और गोंगपा ने 73 सीटों पर चुनाव लड़ा था। सपा का एक विधायक बिजावर से जीता है। गोंगपा महाकौशल और बघेलखंड में कई सीटों पर कड़ी टक्कर देने में सफल रही थी। अब इस गठबंधन का हिस्सा भीम आर्मी की राजनीतिक इकाई आजाद समाज पार्टी और रालोद भी होगा।

सपा और रालोद ओबीसी-मुस्लिम की राजनीति करते हैं। भीम आर्मी दलित की और गोंगपा आदिवासियों की। इस तीसरे मोर्चे में जयस के भी एक धड़े को शामिल करने की तैयारी में है। जयस का एक धड़ा डॉ. आनंद राय की अगुवाई में अलग हो चुका है। इस धड़े ने बीते मंगलवार को ही डॉ. हीरालाल अलावा को साइडलाइन करते हुए लोकेश मुजालदा को राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना है। इस धड़े ने तीसरे मोर्चे के साथ मिलकर 120 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। हालांकि सीटों का बंटवारा तीसरे मोर्चें के घटक दल बाद में करेंगे।

2018 की गलती इस बार नहीं दोहराएंगे एससी-एसटी के वोटर

भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद के मुताबिक 2018 में एससी-एसटी के वोटरों ने कांग्रेस पर भरोसा जताया था। तब जयस का साथ मिलने पर कांग्रेस ने एससी की 35 सीटों में 18 और एसटी की 47 सीटों में 30 सीटों पर जीत दर्ज की थी। बीजेपी के सत्ता से बाहर होने का यही प्रमुख कारण भी था, लेकिन इस बार एससी-एसटी के वोटर अपनी सरकार चुनेंगे। प्रदेश में तीसरा मोर्चा की सरकार बनेगी, तभी सही विकास इन तक पहुंचेगा। हम यही गणित लेकर लोगों के बीच जा रहे हैं। इस मोर्चे में जो जहां पर मजबूत है, वहां की सीटें उसके हिस्से में जाएगी। कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा, ये मिल-बैठकर तय कर लेंगे।

तीसरे मोर्चे की ये है तैयारी–

मालवा-निमाड़– इस अंचल की 66 सीटें प्रदेश की सत्ता की चाबी मानी जाती हैं। भीम आर्मी यहां जयस के साथ मिलकर दलित-आदिवासी समीकरण के सहारे अधिकतर सीटों पर कब्जा जमाने की तैयारी में है। इस अंचल में मुस्लिम भी कई सीटों पर प्रभावी हैं। सपा की मदद से तीसरा मोर्चा मुस्लिम मतदाताओं को साधने की तैयारी में है।

महाकौशल- प्रदेश के दूसरे सबसे बड़े अंचल में 38 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां 2018 में सपा और गोंगपा ने मिलकर कई सीटों पर कड़ी चुनौती दी थी। इस बार भीम आर्मी की सहारे दलित वोटरों को भी साधना है। तीसरा मोर्चा इसी समीकरण के सहारे इस अंचल की 38 सीटों पर बड़ा उलट-फेर करने की जुगत में है।

ग्वालियर-चंबल-राजनीतिक दृष्टि से ये अंचल भी काफी महत्वपूर्ण हैं। इस अंचल में 34 सीटें आती हैं। प्रदेश की सियासत के बड़े-बड़े क्षत्रप इसी अंचल से आते हैं। इस अंचल में भीम आर्मी और सपा की पैठ अच्छी है। तीसरा मोर्चा यहां ओबीसी और दलित-मुस्लिम वोटरों की मदद से मैदान मारने की मंशा में जुटी है।

भोपाल-नर्मदापुरम-प्रदेश का मध्य क्षेत्र में विधानसभा की 32 सीटें आती हैं। प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह इसी अंचल के सीहोर जिले की बुधनी से विधायक हैं। इस अंचल में ओबीसी-दलित-मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं। भीम आर्मी यहां सपा के साथ मिलकर अधिकतर सीटों पर चुनौती देगी।

विंध्य अंचल– प्रदेश का पांचवां सबसे बड़ा अंचल है। यहां प्रदेश की 31 विधासनभा सीटें आती हैं। यहां से भी बीजेपी-कांग्रेस के बडे़ क्षत्रप आते हैं। वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष गिरीश गौतम इसी अंचल से हैं। यहां सपा, भीम आर्मी, गोंगपा प्रभावी भूमिका में है। पिछली बार इस अंचल की कई सीटों पर गोंगपा प्रत्याशियों को 10 से 30 हजार तक वोट मिले थे।

बुंदेलखंड-प्रदेश का सबसे छोटा अंचल है। यहां विधानसभा की 29 सीटें आती हैं। बुंदेलखंड में भोपाल के नजदीक जिलों में बीजेपी-कांग्रेस तो यूपी से सटे जिलों में सपा-बसपा मजबूत हैं। भीम आर्मी ने छतरपुर को केंद्र बनाकर पिछले दिनों आंदोलन किए हैं। यहां सपा के साथ मिलकर भीम आर्मी दलित वोटरों का मजबूत गठजोड़ तैयार करेंगे।

तीसरा मोर्चा से किसे नुकसान, किसका फायदा

प्रदेश में अभी तक मुख्य मुकाबला बीजेपी-कांग्रेस के बीच ही होता रहा है। यहां तीसरे दल के रूप में बसपा ही रही, जो प्रदेश की 50 सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में सफल होती रही है। वहीं गोंगपा और सपा भी कुछ सीटों पर मजबूत चुनौती देते रहे हैं। अब प्रदेश में भीम आर्मी, सपा, रालोद, गोंगपा और जयस के एक धड़े ने मिलकर तीसरा मोर्चा बनाया, तो प्रदेश की सभी 230 सीटों पर लड़ाई त्रिकोणीय होगी।

आम आदमी पार्टी भी इस बार मजबूती से सभी 230 सीटों पर लड़ने का ऐलान कर चुकी है। मतलब कई सीटों पर लड़ाई चतुष्कोणीय होगी। यदि 2018 के चुनाव को आधार मानें तो कांग्रेस के पक्ष में दलित और आदिवासी वोटरों का झुकाव ही उसे सत्ता में लाया था। दलित-आदिवासियों के अलग मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने पर इसका नुकसान कांग्रेस को ही होगा। ये अलग बात है कि यदि चुनाव में तीसरा मोर्चा ने कोई कमाल दिखाया, तो चुनाव बाद बनने वाले गठबंधन में कांग्रेस के लिए समझौते की गुंजाईश अधिक रहेगी।

इसलिए महू को चुना तीसरे मोर्चे के ऐलान के लिए

दलित आंदोलन को डॉ. भीमराव आंबेडकर की जीवनी सदैव प्रेरित करती रही है। देश में अभी बसपा डॉ. आंबेडकर को आदर्श मानकर राजनीति करती रही है। अब इसकी बागडोर पश्चिमी यूपी से आने वाले भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर ने संभाल रखी है। खासकर दलित युवाओं में वे काफी लोकप्रिय हैं। उनकी सभाओं में बड़ी संख्या में लोग शामिल होते रहे हैं। चुनाव से पहले डॉ. आंबेडकर के जन्मस्थान महू से बढ़कर कोई स्थान नहीं हो सकता था, जहां से तीसरा मोर्चा के गठन का शंखनाद किया जाए।

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