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भोपाल25 मिनट पहलेलेखक: संतोष सिंह

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मध्यप्रदेश में इसी साल के नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टियों की गतिविधियां तेज हो गई हैं। भाजपा और कांग्रेस अपने अपने तरीकों से सर्वे कराकर दावेदारों की संभावनाओं को टटोल रही हैं।इधर दावेदार भी सक्रियता दिखा रहे हैं। दैनिक भास्कर ने प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर मैदानी पड़ताल की। ये जाना कि कांग्रेस-भाजपा में कहां, कौन और क्यों दावेदार है? कल मालवा की सीटों की स्थिति बताई थी। पड़ताल की दूसरी कड़ी में आज पढ़िए निमाड़ के 7 जिले की 28 सीटों का हाल..

विधानसभा चुनाव 2018 में बीजेपी को निमाड़ में तगड़ा झटका लगा था, जब पार्टी यहां की 28 सीटों में से महज 8 सीट ही जीत पाई थी। कांग्रेस के 18 विधायक और उसके दो बागी निर्दलीय जीते थे। इन 12 सीटों के अंतर के कारण बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई थी, लेकिन सिंधिया के पाला बदलने के बाद मार्च 2020 में बीजेपी फिर सत्ता पर काबिज हो गई। इसके बाद इस अंचल में सीटों का समीकरण भी बदल गया। कांग्रेस के दो विधायक नारायण सिंह पटेल (मांधाता) और सुमित्रा कासेडकर (नेपानगर) विधायकी से इस्तीफा देकर बीजेपी में शामिल हो गईं। 2020 के उपचुनाव में दोनों फिर जीत कर विधानसभा में पहुंचने में सफल रहे।

मौजूदा समय में बीजेपी के विधायकों की संख्या 10 हो गई है, जबकि खरगोन की बड़वाह सीट से कांग्रेस के टिकट से जीते विधायक सचिन बिरला भी भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इसकी घोषणा लोकसभा उपचुनाव अक्टूबर 2021 से पहले सीएम शिवराज सिंह ने मंच से की थी। वे क्षेत्र में भाजपा विधायक के तौर पर ही सक्रिय हैं लेकिन कांग्रेस भी उनकी सदस्यता समाप्त नहीं करा पाई है। इस कारण तकनीकी रूप से वे कांग्रेस के ही विधायक बने हुए हैं।

नोट: धार, झाबुआ, अलीराजपुर जिले निमाड़ से सटे हैं। यहां निमाड़ की राजनीति का प्रभाव है। इस कारण से इन्हें निमाड़ में शामिल किया गया है।

नोट: धार, झाबुआ, अलीराजपुर जिले निमाड़ से सटे हैं। यहां निमाड़ की राजनीति का प्रभाव है। इस कारण से इन्हें निमाड़ में शामिल किया गया है।

डिस्क्लेमर : इस खबर में विधानसभा चुनाव में टिकट चाहने वाले उन दावेदारों का जिक्र है जो मैदान में सक्रिय हैं। इनमें कुछ खुलकर दावेदारी कर रहे हैं, तो कुछ नामों की क्षेत्र में चर्चा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आएंगे, नए दावेदार भी सामने आ सकते हैं और कुछ दौड़ से बाहर भी हो सकते हैं।

भाजपा से दावेदार–नीना वर्मा का दावा मजबूत, राजीव और करण की भी दावेदारी

नीना वर्मा : तीन बार से विधायक। पति विक्रम वर्मा केंद्रीय मंत्री रहे। ये RSS का गढ़ माना जाता है।

राजीव यादव : भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष। दो साल से सक्रिय हैं। प्रतिदिन बूथों पर जा रहे हैं।

करण सिंह पंवार : पूर्व विधायक हैं। चेहरा बदलने की उम्मीद के साथ वे भी दावेदारी कर रहे हैं।

कांग्रेस से दावेदार– प्रभा की सीट बदली तो बुंदेला भी दावेदार

मनोज सिंह गौतम: प्रभा देवी के पति पूर्व जिला अध्यक्ष बाल मुकुंद सिंह एक बार एक वोट से हारे थे। इस बार उनके भाई मनोज सिंह गौतम सक्रिय हैं।

कुलदीप सिंह बुंदेला : वर्तमान में प्रदेश महासचिव। कमलनाथ के समर्थक। प्रभा को बदनावर भेजा जाता हैं, तो बुंदेला की दावेदारी है।

भाजपा : मंत्री राजवर्धन को राजेश अग्रवाल से चुनौती

राजवर्धन सिंह दत्तीगांव : 2018 में कांग्रेस से जीते, मंत्री बने। बीजेपी में शामिल उपचुनाव में जीते, फिर मंत्री। सिंधिया के समर्थक। टिकट को लेकर निश्चिंत।

राजेश अग्रवाल : स्थानीय चेहरे की मांग ने जोर पकड़ा तो बड़ा चेहरा हैं। इसी आधार पर दावेदारी है। 2018 में निर्दलीय चुनाव लड़ चुके हैं।
भंवर सिंह शेखावत: 2013 में यहां से चुनाव जीत चुके हैं। 2018 में हार गए थे। फिर मौका मिलने की उम्मीद में सक्रिय हैं।

कांग्रेस -पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा करा चुके हैं शरद, बाल मुकुंद आंदोलन में सक्रिय

शरद सिंह सिसौदिया : राजवर्धन सिंह के बीजेपी में शामिल होने के बाद प्रमुख दावेदार हैं। पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा करवा चुके हैं।

बाल मुकुंद सिंह गौतम : पूर्व जिला कांग्रेस अध्यक्ष रहे। वर्तमान में कांग्रेस के कई आंदोलन में सक्रिय दिखे।

कांग्रेस : इकलौते दावेदार हैं ग्रेवाल

प्रताप ग्रेवाल : मौजूदा विधायक हैं। आदिवासी बहुल सीट होने का फायदा। पिछली बार बड़े अंतर से जीते थे। कांग्रेस की ओर से एक मात्र दावेदार हैं।

बीजेपी -वेल, मुकाम और रंजना की दावेदारी

वेल सिंह भूरिया : 2013 में विधायक रह चुके हैं। पिछले चुनाव में बघेल की बड़ी हार के बाद से सक्रिय हैं।

मुकाम सिंह निंगवाल: विधायक रह चुके हैं। आजमाए हुए चेहरे पर फिर दांव लगाने की उम्मीद में दावेदारी कर रहे हैं।

रंजना बघेल : मंत्री रही हैं। संगठन और क्षेत्र में पूरी तरह सक्रिय हैं।

कांग्रेस : उमंग जमानत के बाद फिर सक्रिय

उमंग सिंघार : 2008 से इस आदिवासी बहुल सीट पर जीत रहे हैं। कमलनाथ सरकार में मंत्री रह चुके हैं। फिलहाल पत्नी से रेप के प्रकरण में विवादों में हैं। जमानत के बाद फिर सक्रिय हो गए हैं।

भाजपा : खरे के साथ सांसद दरबार की दावेदारी

निशांत खरे : इंदौर से जुड़े डॉक्टर इस क्षेत्र से सक्रिय हैं और दावेदारी कर रहे हैं।

छतर सिंह दरबार : वर्तमान सांसद हैं। गंधवानी से विधायकी का चुनाव हार चुके हैं। दावेदार के रूप में नाम चर्चा में है।

कांग्रेस –जयस से गठबंधन रहा तो डॉ. हीरालाल को फिर मौका

डॉ. हीरालाल अलावा : कांग्रेस जयस से गठबंधन की हालत में डॉ. अलावा पर ही दांव लगाएगी। जयस के संरक्षक अलावा आदिवासियों में लोकप्रिय हैं।

गजेंद्र सिंह राजुखेडी : पूर्व सांसद और विधायक रहे हैं। जयस से गठबंधन टूटने की स्थिति में प्रमुख दावेदार, इसीलिए क्षेत्र में सक्रिय हैं।

भाजपा : आदिवासी चेहरा रंजना को नए चेहरे के तौर पर शिवराम देंगे चुनौती

रंजना बघेल : तीन बार की विधायक रहीं। पार्टी में बड़ी महिला आदिवासी चेहरा मानी जाती हैं। सरदारपुर के साथ यहां फिर दावेदारी कर रही हैं।

शिवराम कन्नौज: पिता गोपाल कन्नौज पिछली बार निर्दलीय चुनाव लड़े थे। उनके निधन के बाद से सक्रिय हैं। अभी जिला पंचायत सदस्य हैं।

कांग्रसे–पांचीलाल को टक्कर में गजेंद्र सिंह राजूखेडी

पांचीलाल मेड़ा : वर्तमान विधायक हैं। क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। चुनावी तैयारी के हिसाब से सक्रिय हैं।

गजेंद्रसिंह राजुखेडी : अगर कांग्रेस की जयस से दोस्ती बनी रही तो पूर्व सांसद राजूखेडी को धरमपुरी आ सकते हैं, ऐसी चर्चा है।

भाजपा : पूर्व विधायक कालू या जिला महामंत्री जयराम की दावेदारी

कालू सिंह ठाकुर : 2013 में विधायक रहे। 2018 में टिकट काटकर गोपाल कन्नौज को टिकट दिया गया। गोपाल का निधन हो चुका है। कालू सिंह फिर सक्रिय हो गए हैं।

जयराम गावर : मांडव नगर परिषद से पत्नी अध्यक्ष हैं। खुद जिला महामंत्री हैं। नए चेहरे को तौर सक्रियता दिखा रहे हें।

कांग्रेस –सबसे बड़ी जीत दर्ज करने वाले बघेल इकलौते दावेदार

सुरेंद्र सिंह बघेल : प्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशियों में सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी। दो बार से विधायक हैं। दिग्विजय सिंह के गुट से हैं।

भाजपा -यहां भी रंजना का नाम, जयदीप भी दावेदार

रंजना बघेल : पति उप चुनाव में यहां से विधायक रह चुके हैं।

जयदीप सिंह पटेल : भाजपा में प्रदेश मंत्री। नए चेहरे के तौर पर पार्टी दांव लगा सकती है, इस उम्मीद के साथ क्षेत्र में सक्रिय हैं।

कांग्रेस : भूरिया पिता-पुत्र के साथ जेवियर भी दावेदार

कांतिलाल भूरिया : आदिवासियों के बड़े नेता। 2019 के उप चुनाव में कांतिलाल जीते।

विक्रांत भूरिया : कांतिलाल के बेटे हैं। 2020 में यूथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष चुने गए। दिग्विजय सिंह के अलावा यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीनिवासन के करीबी हैं।

जेवियर मेडा : 2008 में विधायक रहे। 10 जनपथ से सीधा संपर्क है। 2019 के उप चुनाव में कमलनाथ ने 2023 में विधानसभा चुनाव लड़ाने का आश्वासन दिया था।

बीजेपी -नए चेहरे भानु को पूर्व विधायक शांतिलाल से चुनौती

भानु भूरिया : दो बार भाजयुमो के जिलाध्यक्ष रहे। एबीवीपी से भी जुड़े थे। युवा चेहरे के तौर पर पहचान है। 5 साल क्षेत्र में सक्रिय रहे।

शांतिलाल बिलवाल : 2013 में विधायक रहे। उप चुनाव में भी वे दावेदार थे। तब भानु भूरिया के नाम पर शांत रह गए। 2023 के लिए एक बार फिर कमर कस चुके हैं।

कांग्रेस : वीर सिंह इकलौते दावेदार

वीर सिंह भूरिया : ये विधानसभा क्षेत्र गुजरात से सटा है। कांग्रेस विधायक भूरिया इस बार भी इकलौते दावेदार हैं।

भाजपा : पूर्व विधायक कल सिंह भाबर और राजू की दावेदारी

कल सिंह भाबर: पूर्व विधायक रहे हैं। पिछली बार चुनाव लड़ चुके हैं। क्षेत्र में सक्रिय हैं।

राजू डामोर: युवा चेहरा। क्षेत्र में अच्छा नेटवर्क है। पार्टी संगठन में भी अच्छी पैठ है। क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं।

कांग्रेस: विधायक बाल सिंह को पूर्व मंत्री पुत्र रूप सिंह और महिला नेत्री कलावती से चुनौती

बाल सिंह मेढ़ा : विधायक हैं। बीजेपी की दिग्गज नेता निर्मला को पिछले चुनाव में हराया था। क्षेत्र में अच्छी पकड़ है।

रूप सिंह डामर : पूर्व मंत्री के पुत्र हैं। पूर्व में भी इस सीट से चुनाव लड़ चुके हैं। खुलकर दावेदारी जता रहे हैं।

कलावती गहलोत : जिला पंचायत सदस्य रह चुकी हैं। बीजेपी की महिला काट के तौर पर दावेदारी मजबूत है।

बीजेपी : चार बार की विधायक निर्मला के साथ धन सिंह का नाम भी चर्चा में

निर्मला भूरिया : 4 बार की विधायक रही हैं। पिछली बार 5 हजार से हार गई थीं। इस बार भी प्रबल दावेदार हैं।

धनसिंह बारिया : झाबुआ नगर पालिका परिषद में अध्यक्ष रहे हैं। नए चेहरे के तौर पर क्षेत्र में सक्रिय हैं।

कांग्रेस : सरल स्वभाव के मुकेश इकलौते दावेदार

मुकेश पटेल : कांग्रेस की ओर से एकमात्र चेहरा माने जा रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में रुझान के चलते लोगों से सीधा जुड़ाव है।

भाजपा : नागर को नए चेहरे के तौर पर वकील सिंह से चुनौती

नागर सिंह चौहान: तीन बार के विधायक। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। संगठन और क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। इस बार भी वे दावेदार हैं।

वकील सिंह ठकराला: सोंडवा जनपद क्षेत्र के सक्रिय नेता है। 2023 तक भाजपा जिला अध्यक्ष रहे। नए चेहरे के तौर पर मौका मिला सकता है।

भाजपा से दावेदार: सुलोचना के बेटे के अलावा माधो सिंह और अनीता भी दावेदार

विशाल रावत : विधायक सुलोचना रावत के पुत्र। सुलोचना ने कांग्रेस से बागी होकर बीजेपी से 2021 में उप चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।

माधो सिंह डावर : शिक्षक पद से इस्तीफा देकर कांग्रेस से राजनीति शुरू की थी। भाजपा शामिल हुए और 2013 में विधायक बने। फिर सक्रियता बढ़ाई है।

अनीता चौहान : पिछली दो परिषद में जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर एकछत्र राज किया। मिलनसार, शिक्षित, शांत सहज और सरल स्वभाव उनकी ताकत है।

कांग्रेस: दबंग छवि के महेश और आदिवासी चेहरा दीपक का नाम

महेश पटेल : क्षेत्र में दबंग नेता की पहचान है। पिता विधायक रहे हैं। उनके भाई आलीराजपुर से विधायक हैं।

दीपक भूरिया : आदिवासी बहुल सीट है। नए चेहरे के तौर पर नाम चर्चा में है। क्षेत्र में सक्रिय भी हैं।

कांग्रेस : महिला चेहरा और इकलौती दावेदार झूमा

झूमा सिंह सोलंकी : दो बार से विधायक हैं। बड़े अंतर से बीजेपी प्रत्याशी को हराया था। महिला चेहरा होने की वजह से महिलाओं में लोकप्रिय।

बीजेपी: पूर्व विधायक धूलसिंह के साथ नंदा और बिहारी की दावेदारी

धूल सिंह डावर : पूर्व विधायक। आदिवासी मतदाताओं में अच्छी पैठ है। दो बार की हार से सहानुभूति भी है।

नंदा ब्राह्माणे : महिला चेहरा। क्षेत्र में सक्रिय हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल हो रही हैं।

बिहारी मोरे : चिरिया मंडल अध्यक्ष। नए चेहरे के तौर पर नाम की चर्चा। आदिवासी युवाओं में भी अच्छी पैठ।

बीजेपी : कांग्रेसी से आए सचिन का दावा मजबूत

सचिन बिरला : कांग्रेसी विधायक हैं, लेकिन अक्टूबर 2021 में बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। क्षेत्र में बीजेपी विधायक की तरह काम कर रहे हैं।

हितेंद्र सिंह सोलंकी : पूर्व विधायक रहे। राजपूत वोटरों में अच्छी पैठ। क्षेत्र में सक्रिय हैं। किसी कारण सचिन नहीं लड़ते हैं तो हितेंद्र दावेदार हैं।

कांग्रेस : नए चेहरे नरेंद्र और निलेश हैं सक्रिय

नरेंद्र पटेल : कांग्रेस के वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं। संगठन में सक्रिय हैं। क्षेत्र में अच्छी पकड़ है।

निलेश रोकड़िया : ब्लाक कांग्रेस अध्यक्ष हैं। बिरला के पार्टी छोड़ने के बाद से क्षेत्र में दौरे बढ़ा दिए हैं। लोगों के सुख-दुख में शामिल हो रहे हैं।

कांग्रेस: पूर्व मंत्री साधौ इकलौती दावेदार

डॉ. विजयलक्ष्मी साधौ: कमलनाथ सरकार में मंत्री रहीं। क्षेत्र में लोगों के बीच उनकी अच्छी पैठ है। कोई माइनस पाइंट नहीं।

बीजेपी : बागी राजकुमार और आशा हैं सक्रिय

राजकुमार मेव : पूर्व विधायक। पिछली बार बागी होकर लड़े थे। बीजेपी प्रत्याशी तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। फिर पार्टी में वापसी हो चुकी है। क्षेत्र में सक्रिय हैं।

आशा वासुरे : महिला चेहरे के तौर पर प्रमुख नाम। करही-पाडल्या नगर परिषद की अध्यक्ष रह चुकी है। पार्टी कार्यक्रमों और सामाजिक क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं।

कांग्रेस : इकलौता चेहरा हैं सचिन

सचिन यादव : वर्तमान विधायक। कांग्रेस सरकार में कृषि मंत्री बने थे। पिता सुभाष यादव पार्टी के कद्दावर चेहरा रहे। क्षेत्र में अच्छी पकड़ है।

बीजेपी: पाटीदार और यादव वोटरों को देखते हुए दावेदारी

आत्माराम पटेल : पूर्व विधायक। पिछली बार करीबी मुकाबले में हार गए थे। क्षेत्र में पटेल व पाटीदार वोटरों पर पकड़।

जितेंद्र पाटीदार : पाटीदार वोटरों को साधने के लिए नए चेहरे के तौर पर नाम चर्चा में। क्षेत्र में सक्रियता बढ़ा दी है।

राजेंद्र यादव : पार्टी के जिलाध्यक्ष रहे। क्षेत्र में यादव वोटरों में सेंध लगाने के लिए पार्टी चेहरा, इसीलिए दावेदारी कर रहे हैं।

कांग्रेस: 35 सालों के अनुभवी जोशी इकलौता चेहरा

रवि जोशी : वर्तमान विधायक। 35 वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं। प्रदेश महासचिव सहित अन्य पदों पर रह चुके हैं। ब्राह्मण मतदाताओं में अच्छी पैठ है।

बीजेपी: बालकृष्ण के साथ राठौर, महाजन व अग्रवाल हैं सक्रिय

राजेंद्र राठौर : भाजपा जिलाध्यक्ष हैं। पार्टी, सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रियता बढ़ाई है।

श्याम महाजन : भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। नए चेहरे के तौर पर क्षेत्र में सक्रिय है।

कल्याण अग्रवाल : प्रदेश कार्य समिति के सदस्य और पूर्व भाजपा जिलाध्यक्ष रहे हैं। पेशे से कॉटन व्यापारी भी हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहते हैं।

बालकृष्ण पाटीदार : दो बार के विधायक। पिछली बार हार गए थे। बावजूद वे पांच साल सक्रिय रहे।

कांग्रेस: बागी केदार के साथ रेडियोलॉजिस्डॉट डॉ. गोविंद सक्रिय

केदार डावर : कांग्रेस से बागी होकर लड़े और जीते थे। कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों को समर्थन दिया। पत्नी जिला पंचायत अध्यक्ष और भाई सेगांव जनपद अध्यक्ष हैं। पिता चार बार कांग्रेस से विधायक रहे।

डॉ. गोविंद मुजाल्दा: शहर के प्रसिद्ध रेडियोलॉजिस्ट हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में खरगोन-बड़वानी से हार गए थे। हार के बावजूद क्षेत्र में सक्रिय हैं।

बीजेपी : जमना के साथ चंदर और बापू सिंह मांग रहे टिकट

जमना सिंह सोलंकी : पिछली बार करीबी मुकाबले में हार गए थे। लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं। आदिवासी वोटरों में पैठ है।

चंदर वास्कले: वर्तमान में जिला महामंत्री हैं। नए चेहरे के रूप में क्षेत्र में सक्रिय हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं में अच्छी पकड़ है।

बापूसिंह परिहार : जिला पंचायत उपाध्यक्ष हैं। जातिगत समीकरण और राजनीतिक सक्रियता के आधार पर दावेदारी जता रहे हैं।

बीजेपी : पिता की विरासत मजबूती से थामे हैं देवेंद्र

देवेंद्र वर्मा : पार्षद से चार बार विधायक बने। संघ से जुड़ाव। पूर्व शिक्षा मंत्री स्वर्गीय किशोरलाल वर्मा के बेटे हैं। इस आरक्षित सीट पर सबसे बड़ा चेहरा हैं।

कांग्रेस : कमलनाथ के खास कुंदन को युवा चेहरा धर्मेंद्र और अरुण समर्थक रणधीर से चुनौती

कुंदन मालवीय : पिछली बार हार गए थे। कमलनाथ के खास समर्थक हैं। कांग्रेस और विधानसभा क्षेत्र में दबंग नेता की छवि है। इस बार भी सक्रिय हैं।

धर्मेंद्र साकल्ले : जनपद पंचायत सदस्य हैं। युवा चेहरा के साथ ग्रामीण क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। प्रदेश नेतृत्व के समक्ष दावेदारी जता चुके हैं।

रणधीर कैथवास : अरुण यादव समर्थकों में शामिल हैं। पूर्व में जिला पंचायत सदस्य और जनपद पंचायत उपाध्यक्ष रहे।

बीजेपी: कांग्रेस से आए नारायण के साथ विजय भी हैं क्षेत्र में सक्रिय

नारायण पटेल : 2018 में कांग्रेस प्रत्याशी के तौर पर भाजपा के कद्दावर नेता नरेंद्र सिंह तोमर को हराया। फिर बीजेपी में शामिल होकर उप चुनाव जीता। पटेल व गुर्जर समाज में पैठ।

विजय बहादुर सिंह तोमर: पूर्व विधायक लोकेंद्र सिंह के बेटे है। क्षेत्र में युवा नेता की पहचान। दादा राणा रघुराज सिंह तोमर भी विधायक रहे। ख़ानदानी विरासत के आधार पर दावेदार।

कांग्रेस: नारायण और उत्तम पाल ठोंक रहे ताल

नारायण सिंह तोमर : पूर्व विधायक राणा रघुराज सिंह के बेटे और लोकेंद्र सिंह के भाई हैं। पिता जैसे ईमानदार, दबंग नेता की छवि। गुर्जर समाज में पैठ।

उत्तम पाल सिंह : पूर्व विधायक राज नारायण सिंह के बेटे हैं। अरुण यादव के धूर विरोधी हैं, पर प्रदेश नेतृत्व में अच्छी पकड़ है। राजपूत करणी सेना से नजदीकी।

बीजेपी : कोर्ट से सजा राम को पड़ सकती है महंगा, शैलेंद्र युवा चेहरे के तौर पर मैदान में सक्रिय

राम दांगोरे : वर्तमान विधायक एवं युवा मोर्चा में प्रदेश महामंत्री हैं। प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा के करीबी हैं। दो महीने पहले हाईकोर्ट ने कालिख कांड में एक साल की सजा सुनाई है।

शैलेंद्र जलोदिया: युवा चेहरा और स्मार्ट वर्कर के साथ शिक्षित और संपन्न किसान हैं। भारतीय किसान संघ से जुड़े हैं। संगठन के स्थानीय नेताओं में पकड़।

कांग्रेस : बाहरी छाया के साथ निर्दलीय चुनाव लड़ीं रूपाली और मनोज मांग रहे टिकट

छाया मोरे : हार के बावजूद विधानसभा क्षेत्र में सक्रिय। अरुण यादव की करीबी हैं।

रूपाली बारे: पिछली बार निर्दलीय चुनाव लड़ी थीं। लोकसभा उपचुनाव में फिर से पार्टी के लिए मेहनत की। कमलनाथ के सामने दावेदारी जता चुकी है।

मनोज भरतकर: जिला पंचायत सदस्य है। ग्रामीण जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। अरुण यादव के समर्थक हैं। विधानसभा चुनाव के लिए दावेदारी जता चुके हैं।

बीजेपी: सात बार के विधायक शाह ही आदिवासी चेहरा

विजय शाह : 7 बार के विधायक। चाैथी बार मंत्री। भाजपा के इकलौते दावेदार हैं।

कांग्रेस : शाह को चुनौती दे रहे दरबार और सुखराम हैं सक्रिय

मुकेश दरबार : मंत्री विजयशाह के बेटे दिव्यादित्य के विरोध में जिला पंचायत का चुनाव लड़ चुके हैं। क्षेत्र में सक्रिय हैं तथा विजय शाह को खुलकर चुनौती दे रहे हैं।

सुखराम साल्वे : पिछली बार हार गए थे। क्षेत्र में सक्रिय हैं। इस बार भी टिकट के दावेदार हैं। हालांकि दरबार की तुलना में दावा कमजोर है।

बीजेपी: दो बार के विधायक प्रेम सिंह के साथ कैलाश हैं सक्रिय

प्रेमसिंह पटेल: दो बार के विधायक। प्रदेश सरकार में मंत्री हैं। सीएम के खास लोगों में शामिल। क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। बेटा बलवंत पटेल जिला पंचायत अध्यक्ष है।

कैलाश वास्कले : जुनाझिरा से लगातार सरपंच हैं। साफ छवि और क्षेत्र के लोगों में अच्छी पकड़ है। आदिवासी वोटरों में प्रभाव है। पिछली बार भी टिकट की दौड़ में थे।

कांग्रेस: दिग्विजय के खास रमेश, वकील राजेंद्र और पूर्व सांसद मकन हैं चेहरा

रमेश पटेल : पूर्व विधायक। दिग्विजय सिंह खेमे के है। पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले आदिवासी वोटरों में अच्छी पैठ है। शहर में लड़ाई शहर बनाम पहाड़ी रहता है।

राजेन्द्र मंडलोई: पेशे से वकील। पार्टी में भी अच्छी पकड़। बागी होकर चुनाव लड़े और दूसरे स्थान पर रहे। इस बार पार्टी की ओर से टिकट के मजबूत दावेदार हैं।

मकन सिंह सोलंकी : भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थामा है। लोकसभा सांसद रहे। दिग्विजय सिंह ने पार्टी में शामिल कराया। टिकट के भी दावेदार हैं।

कांग्रेस : पूर्व गृहमंत्री बाला बच्चन इकलौता चेहरा

बाला बच्चन : कमलनाथ सरकार में गृहमंत्री रहे। क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। हालांकि पिछली बार कांटे के मुकाबले में जीत मिली थी।

बीजेपी : संघ की पसंद के साथ पूर्व सांसद और पूर्व विधायक पुत्र मांग रहे टिकट

संतोष बघेल : संघ में मजबूत संपर्क। पार्टी कार्यकर्ताओं में अच्छी पकड़ है। नए चेहरे के तौर पर सक्रिय हैं।

सुभाष पटेल: पूर्व सांसद। क्षेत्र में अच्छी पकड़। इस बार विधानसभा चुनाव में टिकट के दावेदार हैं।

अंतर पटेल : चार बार के विधायक देवी सिंग के बेटे हैं। पिछली बार विधानसभा चुनाव के वक्त पिता के निधन के बाद टिकट मिला था। करीबी अंतर से हार गए थे।

कांग्रेस: चंद्रभागा के साथ प्रकाश भी हैं सक्रिय

चंद्रभागा किराड़े: कई चुनाव हारने के बाद विधायक चुनी गईं। इस बार भी दावेदार हैं। महिलाओं में लोकप्रिय।

प्रकाश खेड़कर: मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी बेरोजगार प्रकोष्ठ में जिला अध्यक्ष।1994 से लगातार 7 बार से सरपंच रहे। ग्रामीण क्षेत्र में अच्छी पकड़ है।

बीजेपी : दीवान, सचिन और सोलंकी की दावेदारी

दीवान सिंह पटेल: पूर्व विधायक। पिछली बार बड़े अंतर से हार के बावजूद क्षेत्र में सक्रिय हैं।

सचिन चौहान: भाजपा मंडल अध्यक्ष। युवा चेहरा। शासकीय महाविद्यालय में जनभागीदारी के अध्यक्ष हैं। पार्टी के नए चेहरे के तौर पर सामने आ सकते हैं।

डॉ. प्रकाश सोलंकी : पानसेमल कॉलेज के प्रोफेसर। छात्र जीवन में एबीवीवी के जिला सहसंयोजक और शिशु मंदिर के आचार्य रहे। आदिवासी समाज के पूर्व अध्यक्ष।

बीजेपी : तीन बार के विधायक अंतर के साथ डॉ रेलाश सेनानी हैं सक्रिय

अंतरसिंह आर्य: तीन बार विधायक। प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे हैं। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्र में साफ और मजबूत छवि।

डॉ रेलाश सेनानी: भाजपा अजजा मोर्चा जिला अध्यक्ष। संघ पृष्टभूमि से हैं और पेशे दंत चिकित्सक हैं। शासकीय पीजी कॉलेज की जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष हैं। युवाओं में लोकप्रिय हैं।

कांग्रेस: ग्यारसी लाल रावत के साथ जयस से ग्रीष्म और पोरलाल खरते भी दावेदार

ग्यारसी लाल रावत: तीन बार के विधायक। दिग्विजय सिंह के खास लोगों में शामिल। वे क्षेत्र में सक्रिय हैं।

ग्रीष्म कुमार उर्फ मोंटू सोलंकी : जयस जिला अध्यक्ष। युवाओं में लोकप्रिय। समझौते में कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव लड़ सकते हैं।

पोरलाल खरते : वर्तमान में सेल टैक्स ऑफिसर। आदिवासी जन संगठन के बैनर तले सक्रिय हैं। सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में पहचान है।

बीजेपी: अर्चना को हर्षवर्धन और मनोज से चुनौती

अर्चना चिटनिस : प्रदेश सरकार में मंत्री रही हैं। पिछली बार करीबी लड़ाई में हार गई थीं। फिर दावेदार और लगातार सक्रिय हैं।

हर्षवर्धन सिंह चौहान: पूर्व सांसद स्व.नंदकिशोर सिंह चौहान के बेटे हैं। लोकसभा उप चुनाव में टिकट नहीं मिला था। कांग्रेस के ऑफर के बावजूद पार्टी में बने रहे। क्षेत्र में सक्रिय हैं।

मनोज तारवाला: पूर्व नगर निगम अध्यक्ष। शहर में अच्छी पकड़ है। नए चेहरे के तौर पर क्षेत्र में सक्रिय हैं और सामाजिक कार्यों में भागीदारी दिखाते हैं।

कांग्रेस : निर्दलीय शेरा के साथ अजय और गौरी सक्रिय

सुरेंद्र सिंह शेरा: टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय जीते। राहुल गांधी की भारत जोड़ों यात्रा के व्यवस्थापक रहे। जीत के बाद से ही पार्टी विधायक के तौर पर सक्रिय हैं।

अजय रघुवंशी: दो बार नगर निगम महापौर चुनाव हार चुके हैं। वे भी पार्टी की ओर से दावा कर रहे हैं।

गौरी दिनेश शर्मा: पूर्व निगम अध्यक्ष रहीं हैं। महापौर का टिकट नहीं मिला था। विधानसभा का टिकट मांग रही हैं। क्षेत्र में सक्रिय हैं।

बीजेपी : कास्डेकर दंपती के साथ मंजू दादू सक्रिय

सुमित्रा कास्डेकर: कांग्रेस से जीतीं। फिर बीजेपी में शामिल होकर उप चुनाव 2020 में बड़े मार्जिन से जीत दर्ज की। इस बार भी उनका दावा सबसे मजबूत है।

मंजू दादू: पूर्व विधायक। मप्र विपणन बोर्ड की उपाध्यक्ष। क्षेत्र में सक्रिय हैं। पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता के बलबूते दावेदारी जता रही हैं।

राजेश कास्डेकर: सुमित्रा कास्डेकर के पति हैं। इस बार पत्नी की बजाए खुद टिकट मांग रहे हैं।

कांग्रेस: पूर्व जनपद अध्यक्ष निर्मल और ग्रामीण जिलाध्यक्ष रामकिशन मांग रहे टिकट

निर्मला जावरकर: पूर्व जनपद अध्यक्ष। बीजेपी की महिला प्रत्याशी के मुकाबले के लिए नए चेहरे के तौर पर दावेदारी कर रही हैं।

रामकिशन पटेल : ग्रामीण जिलाध्यक्ष। दो बार विधानसभा हार चुके हैं। इस बार भी दावेदारी जता रहे हैं।

कल पढ़िए, बघेलखंड की 30 सीटों में दावेदारों का हाल …

रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली, अनूपपुर, शहडोल और उमरिया जिले में कहां कौन दावेदार है और क्यों? दैनिक भास्कर एप पर कल पूरी रिपोर्ट।

इनपुट : धार – पीयूष जैन, खरगोन-ब्रजेश राठौर, खंडवा– सावन राजपूत, ​​बुरहानपुर -रईस सिद्दकी, आलीराजपुर व झाबुआ– सुहैल कुरैशी।

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